Saturday, October 17, 2026

वजह

आगे किए थे हाथ, उसे बचाने के लिए,

उन्हीं हाथों ने रास्ता दिया मिटाने के लिए।


​जो हाथ उठे थे कभी दुआओं की ख़ातिर,

वही हाथ उठे फिर मज़ार सजाने के लिए।


​सारा आशियाना जलकर ख़ाक हो गया,

लोग जश्न मनाते रहे, उजाला हो गया।


​जो चिंगारी लगाकर शहर जलाता रहा,

वो हँसता हुआ हर बार आगे जाता रहा।


​उजड़ गया आशियाना, बिखर गए ख़्वाब,

जुलाहा फिर भी बुनता रहा फूलों के गुलाब।


​बड़ी हसरतों से चादर-ए-गुल बुन तो दी,

हाय! किस्मत ने वो जनाज़े पर बिछा दी।


​सैलाब उठता रहा, प्रपात बहता रहा,

वक़्त ख़ामोश था, सब कुछ कहता रहा।


​यह कैसी फ़तह, कैसा जश्न, कैसा ये उजाला,

'अवल' ढूँढती रही हर राख में जीने की वजह।


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