आगे किए थे हाथ, उसे बचाने के लिए,
उन्हीं हाथों ने रास्ता दिया मिटाने के लिए।
जो हाथ उठे थे कभी दुआओं की ख़ातिर,
वही हाथ उठे फिर मज़ार सजाने के लिए।
सारा आशियाना जलकर ख़ाक हो गया,
लोग जश्न मनाते रहे, उजाला हो गया।
जो चिंगारी लगाकर शहर जलाता रहा,
वो हँसता हुआ हर बार आगे जाता रहा।
उजड़ गया आशियाना, बिखर गए ख़्वाब,
जुलाहा फिर भी बुनता रहा फूलों के गुलाब।
बड़ी हसरतों से चादर-ए-गुल बुन तो दी,
हाय! किस्मत ने वो जनाज़े पर बिछा दी।
सैलाब उठता रहा, प्रपात बहता रहा,
वक़्त ख़ामोश था, सब कुछ कहता रहा।
यह कैसी फ़तह, कैसा जश्न, कैसा ये उजाला,
'अवल' ढूँढती रही हर राख में जीने की वजह।

