ऐ दोस्त, सब पे ज़रा आज रहम रख,
ठहरा हुआ ये पानी, ये मलबा ज़रा थामकर रख।
ऐ हसीन वादियों, क़सम है आज तुम्हें,
शिकवे-गिले दिल के सभी, आँचल में समेट रख।
हाँ, कुछ ख़ताएँ हुईं हमारे हाथों से अब तक,
तू हमारी तरह न बन, न दिल में अब बैर रख।
तेरी अदाओं को देखने तो आए थे वो लोग,
अब बस कर, अपने चेहरे पे न ये कहर रख।
हर ज़ख़्म को आज वक़्त के हवाले कर दिया,
इंसान की रूह का थोड़ा-सा तो ख़याल रख।
‘अवल’, तू ख़ुद से आज फिर ये वादा कर,
गिरना अगर मुक़द्दर है, तो उठने का ख़्वाब रख।