ये शाम कुछ कहती है, मगर बात नहीं करती,
दिल में उतरती है, मगर आवाज़ नहीं करती।
तनहा-सी झील, पहाड़ों पे ठहरी हुई घटा,
जैसे कोई याद हो, जो दिल से जुदा नहीं करती।
हवा छूकर गुज़रती है पत्तों को धीरे-धीरे,
जैसे कोई बात हो, जो लब से कहा नहीं करती।
सुकून ऐसा कि जैसे तू पास बैठा हो,
ख़ामोशी भी फिर कोई शिकायत नहीं करती।
मैं देर तलक देखती रहती हूँ उस मंज़र को,
आँखें तो बहुत कहती हैं, मगर आवाज नहीं करतीं।
अब इस तन्हाई को भी अपना लिया हमने,
कुछ यादें साथ हों तो तनहाई सता नहीं करती।
दूर होकर भी तू इतना क़रीब लगता है,
ये कैसी मोहब्बत है जो दूरी से डरा नहीं करती।

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